।“कचौड़ी गली सुन कइले बलमू” पर आधारित एक छोटी कविता कचौड़ी गली में गूंजे बतिया, याद आवे बलम के हँसिया। गली-गली महके सोंधी खुशबू, मन खोजे अपना साँवरिया। सेजिया पर लोटे काला नाग हो, बिरहा के डंसे हर रात हो। निंदिया रूठल, चैन न मिलेला, अँखियन बरसे बरसात हो। कचौड़ी गली सुन कइले बलमू, काहे भुलाइल प्यार के बात? दुआर पिया के ताकत रहनी, कट गइल सावन, बीत गइल रात। आजा बलमू, मनवा पुकारे, सूना लागे गाँव-नगरिया। तोहरे बिना फीका लागे, जीवन के हर एक डगरिया।