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Showing posts from June, 2026

कचौड़ी गली सुन कईले बलमु

।“कचौड़ी गली सुन कइले बलमू” पर आधारित एक छोटी कविता कचौड़ी गली में गूंजे बतिया, याद आवे बलम के हँसिया। गली-गली महके सोंधी खुशबू, मन खोजे अपना साँवरिया। सेजिया पर लोटे काला नाग हो, बिरहा के डंसे हर रात हो। निंदिया रूठल, चैन न मिलेला, अँखियन बरसे बरसात हो। कचौड़ी गली सुन कइले बलमू, काहे भुलाइल प्यार के बात? दुआर पिया के ताकत रहनी, कट गइल सावन, बीत गइल रात। आजा बलमू, मनवा पुकारे, सूना लागे गाँव-नगरिया। तोहरे बिना फीका लागे, जीवन के हर एक डगरिया।

उड़ी जब जब जुल्फ़ें तेरी

उड़ी जब जब जुल्फ़ें तेरी, मौसम ने करवट ली, सूखे पत्तों में भी जैसे फिर से हरियाली खिली। तेरी हँसी की हल्की धुन पर शाम भी गुनगुनाती है, चाँद उतर कर खिड़की पे तेरी राह निहारती है। तेरी आँखों की चमक से दीपक भी शर्मा जाए, तेरे कदमों की आहट सुन रास्ता खुद सज जाए। हवा में घुलती खुशबू तेरी मन को बहका जाती है, एक छोटी-सी मुस्कान तेरी दिल में घर कर जाती है। उड़ी जब जब जुल्फ़ें तेरी, दिल ने ये महसूस किया कुछ लोग सिर्फ़ इंसान नहीं, पूरी पूरी ऋतुओं के संप्रेषण  हैं।