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उड़ी जब जब जुल्फ़ें तेरी

उड़ी जब जब जुल्फ़ें तेरी,
मौसम ने करवट ली,
सूखे पत्तों में भी जैसे
फिर से हरियाली खिली।

तेरी हँसी की हल्की धुन पर
शाम भी गुनगुनाती है,
चाँद उतर कर खिड़की पे
तेरी राह निहारती है।

तेरी आँखों की चमक से
दीपक भी शर्मा जाए,
तेरे कदमों की आहट सुन
रास्ता खुद सज जाए।

हवा में घुलती खुशबू तेरी
मन को बहका जाती है,
एक छोटी-सी मुस्कान तेरी
दिल में घर कर जाती है।

उड़ी जब जब जुल्फ़ें तेरी,
दिल ने ये महसूस किया
कुछ लोग सिर्फ़ इंसान नहीं,
पूरी पूरी ऋतुओं के संप्रेषण  हैं।

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