*साका और जौहर* भारत के चमकते चेहरे का विश्व में गुणगान, ये शौर्य, ये त्याग—मेरा गौरव, मेरा अभिमान। आततायी के लिए तो लालच का था सामान, निकल पड़ा लश्कर लेकर निर्दयी अरमान। नरसंहार से थर्राई जन-जन की सांस, रक्तरंजित धरती पर बिखरी पीड़ा की आभास। पर राजपूताना के रणबांकुरे निकल पड़े, कवच, कुंडल, ढाल, तलवार लिए अडिग खड़े। रणभेरी बजी, गूंजा रणभूमि का शंख, हुआ युद्ध घमासान , वीरों ने किया बीस-बीस शत्रुओं का संहार अनंत। अंतिम लड़ाई शान और अभिमान की ठानी, स्त्रियों ने अस्मिता हेतु अग्नि में जौहर वरण की निशानी। मां-बहनों के पावन आशीष का तिलक लगाकर, निकल पड़े वीर रण में, प्राणों का दीप जलाकर। सिंह गर्जना कर घुस पड़े अरिदल के बीच, चमचमाती तलवारों से हुआ रुधिर का नीच। छपक-छपक कर गिरे असंख्य मुंड रण में, बलिदान लिख गया स्वर्णिम इतिहास क्षण-क्षण में। धरती की लाज बची, अस्मिता रही सलामत, साका के बलिदान से हुआ अमरत्व का वरदान। राजपूताना ने इतिहास अमिट बनाया, दुश्मन जीतकर भी अंततः हार गया, बलिदान की पराकाष्ठा देख नतमस्तक हुआ l "विनोद निकुंभ "