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कचौड़ी गली सुन कईले बलमु

।“कचौड़ी गली सुन कइले बलमू” पर आधारित एक छोटी कविता कचौड़ी गली में गूंजे बतिया, याद आवे बलम के हँसिया। गली-गली महके सोंधी खुशबू, मन खोजे अपना साँवरिया। सेजिया पर लोटे काला नाग हो, बिरहा के डंसे हर रात हो। निंदिया रूठल, चैन न मिलेला, अँखियन बरसे बरसात हो। कचौड़ी गली सुन कइले बलमू, काहे भुलाइल प्यार के बात? दुआर पिया के ताकत रहनी, कट गइल सावन, बीत गइल रात। आजा बलमू, मनवा पुकारे, सूना लागे गाँव-नगरिया। तोहरे बिना फीका लागे, जीवन के हर एक डगरिया।
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उड़ी जब जब जुल्फ़ें तेरी

उड़ी जब जब जुल्फ़ें तेरी, मौसम ने करवट ली, सूखे पत्तों में भी जैसे फिर से हरियाली खिली। तेरी हँसी की हल्की धुन पर शाम भी गुनगुनाती है, चाँद उतर कर खिड़की पे तेरी राह निहारती है। तेरी आँखों की चमक से दीपक भी शर्मा जाए, तेरे कदमों की आहट सुन रास्ता खुद सज जाए। हवा में घुलती खुशबू तेरी मन को बहका जाती है, एक छोटी-सी मुस्कान तेरी दिल में घर कर जाती है। उड़ी जब जब जुल्फ़ें तेरी, दिल ने ये महसूस किया कुछ लोग सिर्फ़ इंसान नहीं, पूरी पूरी ऋतुओं के संप्रेषण  हैं।

"अमवा के मोजरा से रस टपके "

अमवा के मोजरा से रस टपके जैसे, वैसे ही तेरा प्यार दिल में घुले। तेरे होठों की लाली से मीठास बरसे, छू ले जो दिल को, ये एहसास खुले l  चाँद सा चेहरा, उजली सी धूप, तेरे बिना सूना लगे हर एक रूप। तेरी नज़र जब मुझसे मिलती, धीरे-धीरे धड़कन भी खिलती… तेरी खुशबू हवा में घुल जाए, हर पल तेरा नाम ही गुनगुनाए। तेरा स्पर्श जैसे कोई जादू, दिल को बना दे मीठा सा काबू l  अमवा के मोजरा से रस टपके जैसे, वैसे ही तेरा प्यार दिल में घुले। तेरे होठों की लाली से मीठास बरसे, छू ले जो दिल को, ये एहसास खुले l 

कुछ दोस्त बहुत याद आते है

कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं कभी गुज़रे पलों से पूछता हूँ तो कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं। कक्षा एक से आठ तक देखूँ तो गाँव की गलियाँ, बस्ते का बोझ और नंगे पाँव की दौड़ बहुत याद आते हैं। आठ से दस का दौर जो सोचूँ तो शहर की कक्षाएँ, कोचिंग की मस्ती, अंगड़ाई लेती उम्मीदें मन को छू जाती हैं। कुछ दोस्त हरदम दिल में कसक छोड़ जाते हैं, गुज़रे पलों को याद करूँ तो दोस्त बहुत याद आते हैं। कॉलेज का अल्हड़ जीवन, शहर बदल जाते हैं, दोस्तों संग विषय से आगे बढ़कर पॉलिटिक्स, समाज और विचारों में उतर जाते हैं। ज्ञान से आगे समाज को समझने के कदम बढ़ जाते हैं, गुज़रे पल याद करूँ तो कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं। प्रेम-प्रसंग की हल्की छाप आज भी आनंद में भिगो जाती है, दोस्तों संग की गप्पें, वो छोटे-छोटे मोमेंट हर रोज़ दिल को छू जाती हैं। गुज़रे पलों को याद करूँ तो रोम-रोम पुलकित हो जाता है, कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं। शाम का खेल, दोस्तों संग की अठखेलियाँ आज भी आँखें नम कर जाती हैं, गुज़रे पल याद करूँ तो कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं… बहुत याद आते हैं।

पिया , तूही मोर सजना हो

प्रिय ,तूही मोर सजना हो ,   तूही मोर प्राण हो l  आंखों की कजरा कहे  माथे की बिंदिया कहे  कानों की बाली,  बालों की गजरा कहे , मेरे सोलह श्रृंगार के  तूही मोर दर्पण हो ,  दिल के धड़कन हो  , तूही मोर सजना हो l प्रिय, तूही मोर प्राण हो l सच कह रही हूं ,  कुछ न चाही ,  यही मेरी इच्छा है l अखियां के सामने रहो  तूही मोर सजना हो,  तूही मोर प्राण हो  दिल के धड़कन हो l         जवाब  रानी तूही मोर खजाना हो तूही मोर हीरा रत्न  हो  रून झुन पायल बजे  सुन मोर मनवा सजे रतिया में आने वाली तूही मोर मीठा सपना हो l रानी , मेरी सजनी हो तूही मोर मीठा रत्न हो l अखियां नशीला लगे , फीका सब इसके आगे लगे , विनोद का सोचले , आखिर रमन हो सच कह रहा हूं रानी मोर खजाना हो हीरा रत्न हो l दिल की धड़कन हो l

साका और जौहर

*साका और जौहर*  भारत के चमकते चेहरे का विश्व में गुणगान, ये शौर्य, ये त्याग—मेरा गौरव, मेरा अभिमान। आततायी के लिए तो लालच का था सामान, निकल पड़ा लश्कर लेकर निर्दयी अरमान। नरसंहार से थर्राई जन-जन की सांस, रक्तरंजित धरती पर बिखरी पीड़ा की आभास। पर राजपूताना के रणबांकुरे निकल पड़े, कवच, कुंडल, ढाल, तलवार लिए अडिग खड़े। रणभेरी बजी, गूंजा रणभूमि का शंख, हुआ युद्ध घमासान ,  वीरों ने किया बीस-बीस शत्रुओं का संहार अनंत। अंतिम लड़ाई शान और अभिमान की ठानी, स्त्रियों ने अस्मिता हेतु अग्नि में जौहर वरण की निशानी। मां-बहनों के पावन आशीष का तिलक लगाकर, निकल पड़े वीर रण में, प्राणों का दीप जलाकर। सिंह गर्जना कर घुस पड़े अरिदल के बीच, चमचमाती तलवारों से हुआ रुधिर का नीच। छपक-छपक कर गिरे असंख्य मुंड रण में, बलिदान लिख गया स्वर्णिम इतिहास क्षण-क्षण में। धरती की लाज बची, अस्मिता रही सलामत, साका के बलिदान से हुआ अमरत्व का वरदान। राजपूताना ने इतिहास अमिट बनाया, दुश्मन जीतकर भी अंततः हार गया, बलिदान की पराकाष्ठा देख नतमस्तक हुआ l           "विनोद निकुंभ "

मृगनैनी आंखों का दीदार

*🎶 गीत – मृगनैनी आँखों का दीदार 🎶*  मृगनैनी आँखों का दीदार हुआ, दिल रोके-रोके न रोके, अब सीमा से पार हुआ॥ चंद्रमुख सा कोमल चेहरा, गजरे से महके बाल, ओष्ठों की लालिमा छेड़े, प्रेमिल मधुर धमाल॥ मृगनैनी आँखों का दीदार हुआ॥ सुराही-सी कोमल गर्दन, रत्नजटित आभूषण, झूमे कर्ण झुमका लेकर, बेचैन हुआ मन॥ मृगनैनी आँखों का दीदार हुआ॥ चोली सजे सुहाग भरी, कमर बंधे करघनी, पतली काया लचक दिखावे, धड़कन गई बहकनी॥ दिल रोके-रोके न रोके, अब सीमा से पार हुआ॥ पायल की झंकार सुनाते, रन-झुन की मधुर तान, मदमस्त चाल अल्हड़ अंगन, छेड़े मन के गान॥ मृगनैनी आँखों का दीदार हुआ॥             "विनोद निकुंभ"               कविता  *मृगनैनी आँखों का दीदार रोके*  मृगनैनी आँखों का दीदार हुआ, दिल रोके-रोके न रोके, अब सीमा से पार हुआ॥ चंद्रमुख सा कोमल चेहरा, गजरे से सुसज्जित केश, ओष्ठों की लालिमा में डूबा चुंबन का हुआ प्रलय विशेष॥ मृगनैनी आँखों का दीदार हुआ॥ सुराही-सी लंबी गर्दन पर, रत्नजटित आभूषण का श्रृंगार, कर्ण झुके झुमके के बोझ तले, अंग-अंग हुआ बेक...