*🎶 गीत – मृगनैनी आँखों का दीदार 🎶*
मृगनैनी आँखों का दीदार हुआ,
दिल रोके-रोके न रोके,
अब सीमा से पार हुआ॥
चंद्रमुख सा कोमल चेहरा,
गजरे से महके बाल,
ओष्ठों की लालिमा छेड़े,
प्रेमिल मधुर धमाल॥
मृगनैनी आँखों का दीदार हुआ॥
सुराही-सी कोमल गर्दन,
रत्नजटित आभूषण,
झूमे कर्ण झुमका लेकर,
बेचैन हुआ मन॥
मृगनैनी आँखों का दीदार हुआ॥
चोली सजे सुहाग भरी,
कमर बंधे करघनी,
पतली काया लचक दिखावे,
धड़कन गई बहकनी॥
दिल रोके-रोके न रोके,
अब सीमा से पार हुआ॥
पायल की झंकार सुनाते,
रन-झुन की मधुर तान,
मदमस्त चाल अल्हड़ अंगन,
छेड़े मन के गान॥
मृगनैनी आँखों का दीदार हुआ॥
"विनोद निकुंभ"
कविता
*मृगनैनी आँखों का दीदार रोके*
मृगनैनी आँखों का दीदार हुआ,
दिल रोके-रोके न रोके,
अब सीमा से पार हुआ॥
चंद्रमुख सा कोमल चेहरा,
गजरे से सुसज्जित केश,
ओष्ठों की लालिमा में डूबा
चुंबन का हुआ प्रलय विशेष॥
मृगनैनी आँखों का दीदार हुआ॥
सुराही-सी लंबी गर्दन पर,
रत्नजटित आभूषण का श्रृंगार,
कर्ण झुके झुमके के बोझ तले,
अंग-अंग हुआ बेक़रार॥
मृगनैनी आँखों का दीदार हुआ॥
वक्ष पर दक्षता की चोली,
कमर पर स्वर्ण करघनी झूले,
पतली काया का अनुपम आकर्षण,
दिल बेक़रार धड़कनें भूले॥
मृगनैनी आँखों का दीदार हुआ॥
पायल की पाजेब झंकार करे,
रन-झुन की मधुर मिठास बिखेरे,
मदमस्त चाल की अल्हड़ अदा,
बदन से बोल अनकहे उभरे॥
हर दिल रोके-रोके न रोके,
अब सीमा से पार हुआ॥
" विनोद निकुंभ "
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