पर्वायवरण हूँ , क्यों करते हो परेशान ?
तुम्हारा ही सेवक , तुम्हारा ही करता देखभाल I
प्रकृति के भंडार को , गर्भ में गृहित करता हूँ
अनाज से आक्सीजन तक , जन -जन तक पहुचता हूँ
प्रदूषण से करू बचाव , जीवन को सफल बनता हूँ
तुम्हारा ही सेवक , तुम्हारा ही करता देखभाल I
आरी चलकर, मेरो पेड़ो को क्यों काटते हो ,
नाला बहाकर, नदियों को क्यों गन्दा करते हो ,
धुवाँ उड़ाकर, हवा में क्यों बिष घोलते हो ,
दुश्मनी है क्या , क्यों करते हो परेशान ,
तुम्हारा ही सेवक , तुम्हारा ही करता देखभाल I
मिट्टी मेरी सोना उगलती है ,
कदली चावल मेवे मिष्ठान, फल उपलब्ध कराती है I
रसायनो की रेलपेल से , उर्वरा शक्ति को क्षीण करते हो ,
दुश्मनी है क्या , क्यों करते हो परेशान ,
तुम्हारा ही सेवक , तुम्हारा ही करता देखभाल I
सम्भलो , जल्दी से सम्भलो , नहीं तो हो जाओगे बर्बाद ,
जीव के नाम पर कहानी सुनोगे ,
हरी भरी घास ,पानी को तरसोगे ,
जल कर भस्म, हो जायेगा सारा जहाँन ,
जिधर देखोगे , उधर ही दिखेगा ,
केवल , केवल रेगिस्तान I
दुश्मनी है क्या , क्यों करते हो परेशान ,
तुम्हारा ही सेवक , तुम्हारा ही करता देखभाल I
विनोद निकुंभ
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