उर्दू और हिंदी भारत भूमि की मौसेरी बहने ।
दोनो की जन्मस्थली भारत के गांव गलियों , चौक चौराहे पर हुआ । उर्दू गजलो , नज्मों, शेर शायरी में पिरोई गई वही हिंदी को दोहे , गीत , लेख , सवैया, चौपाई, में कवियों और लेखकों ने पंक्तिबद्ध किया।
उर्दू जहां प्यार , प्रेम दिल की भाषा बनी वही हिंदी नम्रता , शिष्टाचार , सम्मान की भाषा बनी। दोनो का जब समिश्रण हुआ तो समाज में प्यार और शिष्टाचार ऐसे फला की गंगा जमुनी संस्कृति भारत में लहलहाने लगी ।
प्रेम और सम्मान का समाज में ऐसा आइना विकसित हुआ कि उसको देखकर दूसरे भाषाई भी ललचाने लगे।
जिस भाषा को पढ़कर समझकर , बोलकर हम प्यार, नम्रता, सम्मान का संदेश दे रहे थे उसी भाषा को आज के समाज के कुछ स्वार्थी , निजी हितों को पालने वाले तत्वों ने जहां उर्दू को जेहादी, हत्यारे , आतंकियों की भाषा बना रहे है वही हिंदी का सबसे सम्मानित शब्द राम राम जो सत्य और सुकून अध्यात्म , दिल और मन का मान है उसको जय श्रीराम में परणीत कर उग्रता का रूप देने की नाकाम कोशिश किया जा रहा है।
जो शब्द दिल को प्रफुल्लित और मन को शांति प्रदान करते थे उन्हीं को उतावलेपन और उग्रता का रूप दिया जा रहा है
इस साजिस और स्वार्थ से सता का हित तो साधा जा रहा है मगर हमारा समाज जो वसुधैव कुटुंबकम की धारणा के साथ सदियों से विश्व में सम्मानित है और अपना परचम विश्व के विभिन्न देशों में प्रेम का पाठ पढ़ाकर कर रहे है , उसको अपमानित न होने देंगे।
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