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तेरे नैना की मसखरी में, मग्न हुआ मेरा मन,


                 तेरे नैना
तेरे नैना की मसखरी में, मग्न हुआ मेरा मन,
काजल की कजरी, भृकुटी संग, करते अनुपम श्रृंगार।
सुराही-सी गर्दन पर दमके, स्वर्णजड़ित आभूषण,
देख उन्हें ये चंचल नैना, हो जाते आपे से पार।
बलखाती चाल चलकर , अप्सरा की आभा हर ली,
 इंद्रसभा का वैभव, धरती पर साकार कर दी।
तेरे नैना हैं बेईमान, उनमें उलझा मेरा मन,
तीर भी हैं, तलवार भी हैं, खंजन-नयनों के प्रहार है l
चंद्रमुख से सुंदर मुखड़ा, चाँदनी का श्रृंगार है ,
नीरस से जीवन में रस बरसाएँ, मानो मधु के भंडार है।
क्या तीर हैं, क्या तलवार हैं, ये नैना बड़े कमाल,
काजल की कजरी, भृकुटी संग, करते रूप का श्रृंगार l
   तेरे नैना, तेरे नैना l
                 विनोद निकुंभ

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